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श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

 

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥


Aarti

श्री गणेश जी की आरती 
 
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा .
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
एक दंत दयावंत, चार भुजाधारी .
माथे पे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया .
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
हार चढ़ै, फूल चढ़ै और चढ़ै मेवा .
लड्डुअन को भोग लगे, संत करे सेवा ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥
दीनन की लाज राखो, शंभु सुतवारी .
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा ॥

 

गौरी नंदन जी की आरती 
 
शेंदुर लाल चढ़ायो अच्छा गजमुखको।
दोंदिल लाल बिराजे सुत गौरिहरको।
हाथ लिए गुडलद्दु साँई सुरवरको।
महिमा कहे न जाय लागत हूँ पादको ॥1॥
 
जय जय जी गणराज विद्या सुखदाता।
धन्य तुम्हारा दर्शन मेरा मन रमता ॥धृ॥
 
अष्टौ सिद्धि दासी संकटको बैरि।
विघ्नविनाशन मंगल मूरत अधिकारी।
कोटीसूरजप्रकाश ऐबी छबि तेरी।
गंडस्थलमदमस्तक झूले शशिबिहारि ॥2॥
 
भावभगत से कोई शरणागत आवे।
संतत संपत सबही भरपूर पावे।
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे।
गोसावीनंदन निशिदिन गुन गावे ॥3॥

शिवजी की आरती

 

सत्य, सनातन, सुन्दर शिव! सबके स्वामी।

अविकारी, अविनाशी, अज, अन्तर्यामी॥ हर हर .

आदि, अनन्त, अनामय, अकल कलाधारी।

अमल, अरूप, अगोचर, अविचल, अघहारी॥ हर हर..

ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, तुम त्रिमूर्तिधारी।

कर्ता, भर्ता, धर्ता तुम ही संहारी॥ हरहर ..

रक्षक, भक्षक, प्रेरक, प्रिय औघरदानी।

साक्षी, परम अकर्ता, कर्ता, अभिमानी॥ हरहर ..

मणिमय भवन निवासी, अति भोगी, रागी।

सदा श्मशान विहारी, योगी वैरागी॥ हरहर ..

छाल कपाल, गरल गल, मुण्डमाल, व्याली।

चिताभस्मतन, त्रिनयन, अयनमहाकाली॥ हरहर ..

प्रेत पिशाच सुसेवित, पीत जटाधारी।

विवसन विकट रूपधर रुद्र प्रलयकारी॥ हरहर ..

शुभ्र-सौम्य, सुरसरिधर, शशिधर, सुखकारी।

अतिकमनीय, शान्तिकर, शिवमुनि मनहारी॥ हरहर ..

निर्गुण, सगुण, निरजन, जगमय, नित्य प्रभो।

कालरूप केवल हर! कालातीत विभो॥ हरहर ..

सत्, चित्, आनन्द, रसमय, करुणामय धाता।

प्रेम सुधा निधि, प्रियतम, अखिल विश्व त्राता। हरहर ..

हम अतिदीन, दयामय! चरण शरण दीजै।

सब विधि निर्मल मति कर अपना कर लीजै। हरहर ..

श्री रामचन्द्र जी की आरती
 
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं |
नव कंजलोचन, कंज - मुख, कर - कंज, पद कंजारुणं ||
 
कंन्दर्प अगणित अमित छबि नवनील - नीरद सुन्दरं |
पटपीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमि जनक सुतवरं ||
 
भजु दीनबंधु दिनेश दानव - दैत्यवंश - निकन्दंन |
रधुनन्द आनंदकंद कौशलचन्द दशरथ - नन्दनं ||
 
सिरा मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारु अंग विभूषां |
आजानुभुज शर - चाप - धर सग्राम - जित - खरदूषणमं ||
 
इति वदति तुलसीदास शंकर - शेष - मुनि - मन रंजनं |
मम ह्रदय - कंच निवास कुरु कामादि खलदल - गंजनं ||
 
मनु जाहिं राचेउ मिलहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो |
करुना निधान सुजान सिलु सनेहु जानत रावरो ||
 
एही भाँति गौरि असीस सुनि सिया सहित हियँ हरषीं अली |
तुलसी भवानिहि पूजी पुनिपुनि मुदित मन मन्दिरचली ||
 

श्री हनुमान जी की आरती 
 
आरती कीजै हनुमान लला की | दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ||
जाके बल से गिरिवर काँपे | रोग दोष जाके निकट न झांके ||
अनजानी पुत्र महाबलदायी | संतान के प्रभु सदा सहाई |
दे बीरा रघुनाथ पठाये | लंका जारी सिया सुध लाये ||
लंका सो कोट समुद्र सी खाई | जात पवनसुत बार न लाई ||
लंका जारी असुर संहारे | सियारामजी के काज सँवारे ||
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे | आणि संजीवन प्राण उबारे ||
पैठी पताल तोरि जम कारे | अहिरावण की भुजा उखाड़े ||
बाएं भुजा असुरदल मारे | दाहिने भुजा संतजन तारे ||
सुर-नर-मुनि जन आरती उतारे | जै जै जै हनुमान उचारे ||
कंचन थार कपूर लौ छाई | आरती करत अंजना माई ||
लंकविध्वंस कीन्ह रघुराई | तुलसीदास प्रभु कीरति गाई ||
जो हनुमान जी की आरती गावै | बसी बैकुंठ परमपद पावै ||
आरती कीजै हनुमान लला की | दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ||

श्री शिव  जी की आरती 
 
जय शिव ओंकारा हर जय शिव ओंकारा
ब्रम्हा विष्णु सदा शिव अर्धांगी धारा |
एकानन चतुरानन पंचानन राजे,
हंसानन गरुड़रान वृष वाहन साजे  |
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे,
तिनहू रूप निखरता त्रिभुवन जन मोहे |
अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी;
चन्दन मृग मद सोहे भोले शुभकारी |
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अंगे |
ब्रन्हादिक सनकादिक प्रेतादिक संगे |
कर के बीच कमण्डल चक्र त्रिशूल धारी ,
जगकर्ता जगहर्ता जग पालन कर्ता |
ब्रम्हा विष्णु सदा शिव जानत अविवेका,
प्रणवाक्षर के मध्ये यही तो है तीनो का एका |
भक्ति सहित शिव की आरती जो कोई नर गावे,
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे |

आरती श्री विश्वकर्मा जी की
 
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा |
सकल सृष्टि के करता, रक्षक स्तुति धर्मा ||
 
आदि सृष्टि मे विधि को श्रुति उपदेश दिया |
जीव मात्रा का जाग मे, ज्ञान विकास किया ||
 
ऋषि अंगीरा ताप से, शांति नहीं पाई |
रोग ग्रस्त राजा ने जब आश्रया लीना |
संकट मोचन बनकर डोर दुःखा कीना ||
जय श्री विश्वकर्मा.
 
जब रथकार दंपति, तुम्हारी टर करी |
सुनकर दीं प्रार्थना, विपत हरी सागरी ||
 
एकानन चतुरानन, पंचानन राजे |
त्रिभुज चतुर्भुज दशभुज, सकल रूप सजे ||
 
ध्यान धरे तब पद का, सकल सिद्धि आवे |
मन द्विविधा मिट जावे, अटल शक्ति पावे ||
 
श्री विश्वकर्मा की आरती जो कोई गावे |
भाजात गजानांद स्वामी, सुख संपाति पावे ||
जय श्री विश्वकर्मा.

 श्री विष्णु  जी की आरती 
 
जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, छन में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसै मनका।
सुख सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तनका॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ 
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ 
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मुरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमती॥
दीनबन्धु, दु:खहर्ता तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ 
जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे...

श्री जानकीनाथ जी की आरती 
 
ओउम जय जानकिनाथा,
हो प्रभु जय श्री रघुनाथा।
दोउ कर जोड़े विनवौं,
प्रभु मेरी सुनो बाता॥ ओउम॥
 
तुम रघुनाथ हमारे,
प्राण पिता माता।
तुम हो सजन संघाती,
भक्ति मुक्ति दाता ॥ ओउम॥
 
चौरासी प्रभु फन्द छुड़ावो,
मेटो यम त्रासा।
निश दिन प्रभु मोहि राखो,
अपने संग साथा॥ ओउम॥
 
सीताराम लक्ष्मण भरत शत्रुहन,
संग चारौं भैया।
जगमग ज्योति विराजत,
शोभा अति लहिया॥ ओउम॥
 
हनुमत नाद बजावत,
नेवर ठुमकाता।
कंचन थाल आरती,
करत कौशल्या माता॥ ओउम॥
 
किरिट मुकुट कर धनुष विराजत, 
शोभा अति भारी।
मनीराम दरशन कर, तुलसिदास दरशन कर, 
पल पल बलिहारी॥ ओउम॥
 
जय जानकिनाथा,
हो प्रभु जय श्री रघुनाथा।
हो प्रभु जय सीता माता,
हो प्रभु जय लक्ष्मण भ्राता॥ ओउम॥
 
हो प्रभु जय चारौं भ्राता,
हो प्रभु जय हनुमत दासा।
दोउ कर जोड़े विनवौं,
प्रभु मेरी सुनो बाता॥ ओउम॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

jai saraswati mata

jai kali mata

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥


Chalisa

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥


|| चौपाई ||

जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥१

जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥२

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥३

राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥४

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥५

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥६

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥७

ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्घारे॥८

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥९

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी।१०

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥११

अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥१२

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥१३

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला। बिना गर्भ धारण, यहि काला॥१४

गणनायक, गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥१५

अस कहि अन्तर्धान रुप है। पलना पर बालक स्वरुप है॥१६

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥१७

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥१८

शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥१९

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥२०

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं॥२१

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥२२

कहन लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥२३

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ॥२४

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा। बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥२५

गिरिजा गिरीं विकल है धरणी। सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥२६

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥२७

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥२८

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥२९

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे॥३०

बुद्घि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥३१

चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥३२

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥३३

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥३४

तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥३५

मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥३६

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा॥३७

अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥३८

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।३९

नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥४०


|| दोहा ||

सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥


|| इति श्री गणेश चालीसा समाप्त ||


 

श्री हनुमान चालीसा
 
|| दोहा ||
 
श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारी
बराणु रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार
 
|| चौपाई ||
 
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥
 
राम दूत अतुलित बल धामा
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥
 
महाबीर बिक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥
 
कंचन बरन बिराज सुबेसा
कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥
 
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥
 
शंकर सुवन केसरी नंदन
तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥
 
विद्यावान गुनी अति चातुर
राम काज करिबे को आतुर॥७॥
 
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया
राम लखन सीता मनबसिया॥८॥
 
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा
विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥
 
भीम रूप धरि असुर सँहारे
रामचंद्र के काज सवाँरे॥१०॥
 
लाय सजीवन लखन जियाए
श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥११॥
 
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥१२॥
 
सहस बदन तुम्हरो जस गावै
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥
 
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा
नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥
 
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥
 
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
 
तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥
 
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥
 
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही
जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥१९॥
 
दुर्गम काज जगत के जेते
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
 
राम दुआरे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥
 
सब सुख लहैं तुम्हारी सरना
तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥
 
आपन तेज सम्हारो आपै
तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥
 
भूत पिशाच निकट नहि आवै
महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥
 
नासै रोग हरे सब पीरा
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥
 
संकट तै हनुमान छुडावै
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥
 
सब पर राम तपस्वी राजा
तिनके काज सकल तुम साजा॥२७॥
 
और मनोरथ जो कोई लावै
सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥
 
चारों जुग परताप तुम्हारा
है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥
 
साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥
 
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता
अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
 
राम रसायन तुम्हरे पासा
सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
 
तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
 
अंतकाल रघुवरपुर जाई
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥
 
और देवता चित्त ना धरई
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥
 
संकट कटै मिटै सब पीरा
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥
 
जै जै जै हनुमान गुसाईँ
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥
 
जो सत बार पाठ कर कोई
छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥
 
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा
होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥
 
तुलसीदास सदा हरि चेरा
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥
 
|| दोहा ||
 
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
 
|| इति श्री हनुमान चालीसा समाप्त ||

 

श्री शिव चालीसा

|| दोहा ||

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

|| चौपाई ||

जय गिरिजा पति दीन दयाला । सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके । कानन कुण्डल नागफनी के॥

अंग गौर शिर गंग बहाये । मुण्डमाल तन छार लगाये ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे । छवि को देख नाग मुनि मोहे ॥

मैना मातु की ह्वै दुलारी । बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी । करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे । सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ । या छवि को कहि जात न काऊ ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा । तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी । देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ । लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई । सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी । पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं । सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद नाम महिमा तव गाई । अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला । जरे सुरासुर भये विहाला ॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई । नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा । जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
सहस कमल में हो रहे धारी । कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई । कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर । भये प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनंत अविनाशी । करत कृपा सब के घटवासी ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै ॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो । यहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो । संकट से मोहि आन उबारो ॥

मातु पिता भ्राता सब कोई । संकट में पूछत नहिं कोई ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी । आय हरहु अब संकट भारी ॥

धन निर्धन को देत सदाहीं । जो कोई जांचे वो फल पाहीं ॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी । क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन । मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं । नारद शारद शीश नवावैं ॥

नमो नमो जय नमो शिवाय । सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
जो यह पाठ करे मन लाई । ता पार होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी । पाठ करे सो पावन हारी ॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई । निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे । ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा । तन नहीं ताके रहे कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे । शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
जन्म जन्म के पाप नसावे । अन्तवास शिवपुर में पावे ॥

कहे अयोध्या आस तुम्हारी । जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥ दोहा ॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥

॥ इति श्री शिव चालीसा समाप्त ||

 

 

श्री शनि चालीसा

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुःख दूर करि , कीजै नाथ निहाल ॥1॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु , सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय , राखहु जन की लाज ॥2॥

|| चौपाई ||

जयति जयति शनिदेव दयाला । करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै । माथे रतन मुकुट छवि छाजै ॥

परम विशाल मनोहर भाला । टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥
कुण्डल श्रवन चमाचम चमके । हिये माल मुक्तन मणि दमकै ॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा । पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥
पिंगल, कृष्णो, छाया, नन्दन । यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख भंजन ॥

सौरी, मन्द शनी दश नामा । भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥
जापर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं । रंकहुं राव करैं क्षण माहीं ॥

पर्वतहू तृण होइ निहारत । तृणहू को पर्वत करि डारत ॥
राज मिलत वन रामहिं दीन्हयो । कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥

वनहुं में मृग कपट दिखाई । मातु जानकी गई चुराई ॥
लषणहिं शक्ति विकल करिडारा । मचिगा दल में हाहाकारा ॥

रावण की गति-मति बौराई । रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥
दियो कीट करि कंचन लंका । बजि बजरंग बीर की डंका ॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा । चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥
हार नौलखा लाग्यो चोरी । हाथ पैर डरवायो तोरी ॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो । तेलहिं घर कोल्हू चलवायो ॥
विनय राग दीपक महँ कीन्हयों । तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी । आपहुं भरे डोम घर पानी ॥
तैसे नल पर दशा सिरानी । भूंजी-मीन कूद गई पानी ॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई । पारवती को सती कराई ॥
तनिक विकलोकत ही करि रीसा । नभ उड़ि गतो गौरिसुत सीसा ॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी । बची द्रोपदी होति उधारी ॥
कौरव के भी गति मति मारयो । युद्ध महाभारत करि डारयो ॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला । लेकर कूदि परयो पाताला ॥
शेष देव-लखि विनती लाई । रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥

वाहन प्रभु के सात सुजाना । जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥
जम्बुक सिह आदि नख धारी । सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं । हय ते सुख सम्पत्ति उपजावै ॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा । सिह सिद्ध्कर राज समाजा ॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै । मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥
जब आवहिं स्वान सवारी । चोरी आदि होय डर भारी ॥

तैसहि चारि चरण यह नामा । स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं । धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥

समता ताम्र रजत शुभकारी । स्वर्ण सर्वसुख मंगल भारी ॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै । कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला । करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई । विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत । दीप दान दै बहु सुख पावत ॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा । शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥

॥ दोहा ॥

पाठ शनिश्चर देव को, की हों 'भक्त' तैयार ।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥

॥इति श्री शनि चालीसा समाप्त

श्री राम चालीसा
 
॥ चौपाई ॥
 
श्री रघुबीर भक्त हितकारी । सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥
 
 निशि दिन ध्यान धरै जो कोई । ता सम भक्त और नहीं होई ॥
 
ध्यान धरें शिवजी मन मांही । ब्रह्मा, इन्द्र पार नहीं पाहीं ॥
 
दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहुं पुर जाना ॥
 
जय, जय, जय रघुनाथ कृपाला । सदा करो संतन प्रतिपाला ॥
 
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥
 
तुम अनाथ के नाथ गोसाईं । दीनन के हो सदा सहाई ॥
 
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं । सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥
 
चारिउ भेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखी ॥
 
गुण गावत शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहिं ॥
 
नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहीं होई ॥
 
राम नाम है अपरम्पारा । चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥
 
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ॥
 
शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ॥
 
फूल समान रहत सो भारा । पावत कोऊ न तुम्हरो पारा ॥
 
भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहूं न रण में हारो ॥
 
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥
 
लखन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ॥
 
ताते रण जीते नहिं कोई । युद्ध जुरे यमहूं किन होई ॥
 
महालक्ष्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को छारा ॥
 
सीता राम पुनीता गायो । भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥
 
घट सों प्रकट भई सो आई । जाको देखत चन्द्र लजाई ॥
 
जो तुम्हरे नित पांव पलोटत । नवो निद्धि चरणन में लोटत ॥
 
सिद्धि अठारह मंगलकारी । सो तुम पर जावै बलिहारी ॥
 
औरहु जो अनेक प्रभुताई । सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥
 
इच्छा ते कोटिन संसारा । रचत न लागत पल की बारा ॥
 
जो तुम्हरे चरणन चित लावै । ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ॥
 
सुनहु राम तुम तात हमारे । तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ॥
 
तुमहिं देव कुल देव हमारे । तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥
 
जो कुछ हो सो तुमहिं राजा । जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥
 
राम आत्मा पोषण हारे । जय जय जय दशरथ के प्यारे ॥
 
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा । नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा ॥
 
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी । सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥
 
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै । सो निश्चय चारों फल पावै ॥
 
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं । तुमने भक्तिहिं सब सिधि दीन्हीं ॥
 
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा । नमो नमो जय जगपति भूपा ॥
 
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा । नाम तुम्हार हरत संतापा ॥
 
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया । बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥
 
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन । तुम ही हो हमरे तन-मन धन ॥
 
याको पाठ करे जो कोई । ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥
 
आवागमन मिटै तिहि केरा । सत्य वचन माने शिव मेरा ॥
 
और आस मन में जो होई । मनवांछित फल पावे सोई ॥
 
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै । तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥
 
साग पत्र सो भोग लगावै । सो नर सकल सिद्धता पावै ॥
 
अन्त समय रघुबर पुर जाई । जहां जन्म हरि भक्त कहाई ॥
 
श्री हरिदास कहै अरु गावै । सो बैकुण्ठ धाम को पावै ॥
 
 ॥ दोहा ॥
 
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय ।
 
हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय ॥
 
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय ।
 
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय ॥
 
॥ इति श्री राम  चालीसा समाप्त ||
 

श्री   दुर्गा   चालीसा

|| चौपाई ||

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै ।जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ सन्तन र जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥
अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नरनारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्ममरण ताकौ छुटि जाई॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥
शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब बिनशावें॥
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला॥
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥
देवीदास शरण निज जानी। कहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा समाप्त ||

श्री  संतोषी चालीसा

॥ दोहा ॥

बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार।
ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार॥
भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम।
कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम॥

|| चौपाई ||

जय सन्तोषी मात अनूपम। शान्ति दायिनी रूप मनोरम॥

सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा। वेश मनोहर ललित अनुपा॥
श्‍वेताम्बर रूप मनहारी। माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी॥
दिव्य स्वरूपा आयत लोचन। दर्शन से हो संकट मोचन॥
जय गणेश की सुता भवानी। रिद्धि- सिद्धि की पुत्री ज्ञानी॥
अगम अगोचर तुम्हरी माया। सब पर करो कृपा की छाया॥
नाम अनेक तुम्हारे माता। अखिल विश्‍व है तुमको ध्याता॥
तुमने रूप अनेकों धारे। को कहि सके चरित्र तुम्हारे॥
धाम अनेक कहाँ तक कहिये। सुमिरन तब करके सुख लहिये॥
विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी। कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी॥
कलकत्ते में तू ही काली। दुष्‍ट नाशिनी महाकराली॥
सम्बल पुर बहुचरा कहाती। भक्तजनों का दुःख मिटाती॥
ज्वाला जी में ज्वाला देवी। पूजत नित्य भक्त जन सेवी॥
नगर बम्बई की महारानी। महा लक्ष्मी तुम कल्याणी॥
मदुरा में मीनाक्षी तुम हो। सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो॥
राजनगर में तुम जगदम्बे। बनी भद्रकाली तुम अम्बे॥
पावागढ़ में दुर्गा माता। अखिल विश्‍व तेरा यश गाता॥
काशी पुराधीश्‍वरी माता। अन्नपूर्णा नाम सुहाता॥
सर्वानन्द करो कल्याणी। तुम्हीं शारदा अमृत वाणी॥
तुम्हरी महिमा जल में थल में। दुःख दारिद्र सब मेटो पल में॥
जेते ऋषि और मुनीशा। नारद देव और देवेशा।
इस जगती के नर और नारी। ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी॥
जापर कृपा तुम्हारी होती। वह पाता भक्ति का मोती॥
दुःख दारिद्र संकट मिट जाता। ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता॥
जो जन तुम्हरी महिमा गावै। ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै॥
जो मन राखे शुद्ध भावना। ताकी पूरण करो कामना॥
कुमति निवारि सुमति की दात्री। जयति जयति माता जगधात्री॥
शुक्रवार का दिवस सुहावन। जो व्रत करे तुम्हारा पावन॥
गुड़ छोले का भोग लगावै। कथा तुम्हारी सुने सुनावै॥
विधिवत पूजा करे तुम्हारी। फिर प्रसाद पावे शुभकारी॥
शक्ति- सामरथ हो जो धनको। दान- दक्षिणा दे विप्रन को॥
वे जगती के नर औ नारी। मनवांछित फल पावें भारी॥
जो जन शरण तुम्हारी जावे। सो निश्‍चय भव से तर जावे॥
तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे। निश्‍चय मनवांछित वर पावै॥
सधवा पूजा करे तुम्हारी। अमर सुहागिन हो वह नारी॥
विधवा धर के ध्यान तुम्हारा। भवसागर से उतरे पारा॥
जयति जयति जय संकट हरणी। विघ्न विनाशन मंगल करनी॥
हम पर संकट है अति भारी। वेगि खबर लो मात हमारी॥
निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता। देह भक्ति वर हम को माता॥
यह चालीसा जो नित गावे। सो भवसागर से तर जावे॥

॥ इति श्री संतोषी चालीसा समाप्त ||

श्री सरस्वती चालीसा

|| दोहा ||

जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
दुष्जनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥

|| चौपाई ||

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
जय जय जय वीणाकर धारी।करती सदा सुहंस सवारी॥
रूप चतुर्भुज धारी माता।सकल विश्व अन्दर विख्याता॥
जग में पाप बुद्धि जब होती।तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥
तब ही मातु का निज अवतारी।पाप हीन करती महतारी॥
वाल्मीकिजी थे हत्यारा।तव प्रसाद जानै संसारा॥
रामचरित जो रचे बनाई।आदि कवि की पदवी पाई॥
कालिदास जो भये विख्याता।तेरी कृपा दृष्टि से माता॥
तुलसी सूर आदि विद्वाना।भये और जो ज्ञानी नाना॥
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा।केव कृपा आपकी अम्बा॥
करहु कृपा सोइ मातु भवानी।दुखित दीन निज दासहि जानी॥
पुत्र करहिं अपराध बहूता।तेहि न धरई चित माता॥
राखु लाज जननि अब मेरी।विनय करउं भांति बहु तेरी॥
मैं अनाथ तेरी अवलंबा।कृपा करउ जय जय जगदंबा॥
मधुकैटभ जो अति बलवाना।बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥
समर हजार पाँच में घोरा।फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥
मातु सहाय कीन्ह तेहि काला।बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥
चंड मुण्ड जो थे विख्याता।क्षण महु संहारे उन माता॥
रक्त बीज से समरथ पापी।सुरमुनि हदय धरा सब काँपी॥
काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा।बारबार बिन वउं जगदंबा॥
जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा।क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥
भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई।रामचन्द्र बनवास कराई॥
एहिविधि रावण वध तू कीन्हा।सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥
को समरथ तव यश गुन गाना।निगम अनादि अनंत बखाना॥
विष्णु रुद्र जस कहिन मारी।जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥
रक्त दन्तिका और शताक्षी।नाम अपार है दानव भक्षी॥
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥
दुर्ग आदि हरनी तू माता।कृपा करहु जब जब सुखदाता॥
नृप कोपित को मारन चाहे।कानन में घेरे मृग नाहे॥
सागर मध्य पोत के भंजे।अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥
भूत प्रेत बाधा या दुःख में।हो दरिद्र अथवा संकट में॥
नाम जपे मंगल सब होई।संशय इसमें करई न कोई॥
पुत्रहीन जो आतुर भाई।सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥
करै पाठ नित यह चालीसा।होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥
धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै।संकट रहित अवश्य हो जावै॥
भक्ति मातु की करैं हमेशा।निकट न आवै ताहि कलेशा॥
बंदी पाठ करें सत बारा।बंदी पाश दूर हो सारा॥
रामसागर बाँधि हेतु भवानी।कीजै कृपा दास निज जानी॥

|| दोहा ||

मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप।
डूबन से रक्षा करहु परूँ न मैं भव कूप॥
बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु।
राम सागर अधम को आश्रय तू ही देदातु॥

॥ इति श्री  सरस्वती चालीसा समाप्त ||

श्री  संतोषी चालीसा

॥ दोहा ॥

बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार।
ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार॥
भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम।
कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम॥

|| चौपाई ||

जय सन्तोषी मात अनूपम। शान्ति दायिनी रूप मनोरम॥

सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा। वेश मनोहर ललित अनुपा॥
श्‍वेताम्बर रूप मनहारी। माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी॥
दिव्य स्वरूपा आयत लोचन। दर्शन से हो संकट मोचन॥
जय गणेश की सुता भवानी। रिद्धि- सिद्धि की पुत्री ज्ञानी॥
अगम अगोचर तुम्हरी माया। सब पर करो कृपा की छाया॥
नाम अनेक तुम्हारे माता। अखिल विश्‍व है तुमको ध्याता॥
तुमने रूप अनेकों धारे। को कहि सके चरित्र तुम्हारे॥
धाम अनेक कहाँ तक कहिये। सुमिरन तब करके सुख लहिये॥
विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी। कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी॥
कलकत्ते में तू ही काली। दुष्‍ट नाशिनी महाकराली॥
सम्बल पुर बहुचरा कहाती। भक्तजनों का दुःख मिटाती॥
ज्वाला जी में ज्वाला देवी। पूजत नित्य भक्त जन सेवी॥
नगर बम्बई की महारानी। महा लक्ष्मी तुम कल्याणी॥
मदुरा में मीनाक्षी तुम हो। सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो॥
राजनगर में तुम जगदम्बे। बनी भद्रकाली तुम अम्बे॥
पावागढ़ में दुर्गा माता। अखिल विश्‍व तेरा यश गाता॥
काशी पुराधीश्‍वरी माता। अन्नपूर्णा नाम सुहाता॥
सर्वानन्द करो कल्याणी। तुम्हीं शारदा अमृत वाणी॥
तुम्हरी महिमा जल में थल में। दुःख दारिद्र सब मेटो पल में॥
जेते ऋषि और मुनीशा। नारद देव और देवेशा।
इस जगती के नर और नारी। ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी॥
जापर कृपा तुम्हारी होती। वह पाता भक्ति का मोती॥
दुःख दारिद्र संकट मिट जाता। ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता॥
जो जन तुम्हरी महिमा गावै। ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै॥
जो मन राखे शुद्ध भावना। ताकी पूरण करो कामना॥
कुमति निवारि सुमति की दात्री। जयति जयति माता जगधात्री॥
शुक्रवार का दिवस सुहावन। जो व्रत करे तुम्हारा पावन॥
गुड़ छोले का भोग लगावै। कथा तुम्हारी सुने सुनावै॥
विधिवत पूजा करे तुम्हारी। फिर प्रसाद पावे शुभकारी॥
शक्ति- सामरथ हो जो धनको। दान- दक्षिणा दे विप्रन को॥
वे जगती के नर औ नारी। मनवांछित फल पावें भारी॥
जो जन शरण तुम्हारी जावे। सो निश्‍चय भव से तर जावे॥
तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे। निश्‍चय मनवांछित वर पावै॥
सधवा पूजा करे तुम्हारी। अमर सुहागिन हो वह नारी॥
विधवा धर के ध्यान तुम्हारा। भवसागर से उतरे पारा॥
जयति जयति जय संकट हरणी। विघ्न विनाशन मंगल करनी॥
हम पर संकट है अति भारी। वेगि खबर लो मात हमारी॥
निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता। देह भक्ति वर हम को माता॥
यह चालीसा जो नित गावे। सो भवसागर से तर जावे॥

॥ इति श्री संतोषी चालीसा समाप्त ||

श्री कृष्ण चालीसा 

|| दोहा || 
 
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्ब फल, नयन कमल अभिराम॥१
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥२
 
 
|| चौपाई || 
 
जय यदुनन्दन जय जगवन्दन। 
जय वसुदेव देवकी नन्दन॥१
 
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। 
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥२
 
जय नट-नागर नाग नथइया। 
कृष्ण कन्हैया धेनु चरइया॥३
 
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। 
आओ दीनन कष्ट निवारो॥४
 
वंशी मधुर अधर धरि टेरो। 
होवे पूर्ण विनय यह मेरो॥५
 
आओ हरि पुनि माखन चाखो। 
आज लाज भारत की राखो॥६
 
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। 
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥७
 
राजित राजिव नयन विशाला। 
मोर मुकुट वैजन्ती माला॥८
 
कुण्डल श्रवण पीत पट आछे। 
कटि किंकणी काछनी काछे॥९
 
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। 
छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥१०
 
मस्तक तिलक, अलक घुंघराले। 
आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥११
 
करि पय पान, पूतनहि तारयो। 
अका बका कागासुर मारयो॥१२
 
मधुबन जलत अगिन जब ज्वाला। 
भै शीतल, लखतहिं नन्दलाला॥१३
 
सुरपति जब ब्रज चढ्यो रिसाई। 
मसूर धार वारि वर्षाई॥१४
 
लगत-लगत ब्रज चहन बहायो। 
गोवर्धन नख धारि बचायो॥१५
 
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। 
मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥१६
 
दुष्ट कंस अति उधम मचायो। 
कोटि कमल जब फूल मंगायो॥१७
 
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। 
चरणचिन्ह दै निर्भय कीन्हें॥१८
 
करि गोपिन संग रास विलासा। 
सबकी पूरण करि अभिलाषा॥१९
 
केतिक महा असुर संहारयो। 
कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥२०
 
मात-पिता की बन्दि छुड़ाई। 
उग्रसेन कहं राज दिलाई॥२१
 
महि से मृतक छहों सुत लायो। 
मातु देवकी शोक मिटायो॥२२
 
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। 
लाये षट दश सहसकुमारी॥२३
 
दै भीमहिं तृण चीर सहारा। 
जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥२४
 
असुर बकासुर आदिक मारयो। 
भक्तन के तब कष्ट निवारयो॥२५
 
दीन सुदामा के दुख टारयो। 
तंदुल तीन मूंठि मुख डारयो॥२६
 
प्रेम के साग विदुर घर मांगे। 
दुर्योधन के मेवा त्यागे॥२७
 
लखि प्रेम की महिमा भारी। 
ऐसे याम दीन हितकारी॥२८
 
भारत के पारथ रथ हांके। 
लिए चक्र कर नहिं बल ताके॥२९
 
निज गीता के ज्ञान सुनाये। 
भक्तन हृदय सुधा वर्षाये॥३०
 
मीरा थी ऐसी मतवाली। 
विष पी गई बजा कर ताली॥३१
 
राना भेजा सांप पिटारी। 
शालिग्राम बने बनवारी॥३२
 
निज माया तुम विदिहिं दिखायो। 
उर ते संशय सकल मिटायो॥३३
 
तब शत निन्दा करि तत्काला। 
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥३४
 
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। 
दीनानाथ लाज अब जाई॥३५
 
तुरतहिं बसन बने नन्दलाला। 
बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥३६
 
अस नाथ के नाथ कन्हैया। 
डूबत भंवर बचावइ नइया॥३७
 
सुन्दरदास आस उर धारी। 
दया दृष्टि कीजै बनवारी॥३८
 
नाथ सकल मम कुमति निवारो। 
क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥३९
 
खोलो पट अब दर्शन दीजै। 
बोलो कृष्ण कन्हैया की जै॥४०
 
 
|| दोहा ||
 
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्घि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥
 
॥ इति श्री  कृष्ण  चालीसा समाप्त ||
 

श्री लक्ष्मी चालीसा
 
|| दोहा || 
 
मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।
मनो कामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥
सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।
ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ 
 
|| चौपाई || 
 
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥
जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥
तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी ख़ासी॥
जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहँ तक महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भाँति मन लाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥
ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥
त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥
जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥
ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।
पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज़ प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूँ नाहीं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥
भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥
बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥
रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥
 
|| दोहा || 
 
त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर ज़ोर।
मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥
 
॥ इति श्री  लक्ष्मी चालीसा समाप्त ||

श्री गायत्री चालीसा
 
|| दोहा ||
 
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचण्ड॥
शान्ति कान्ति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखण्ड॥
जगत जननी मङ्गल करनि गायत्री सुखधाम।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम॥
 
 
|| चौपाई ||
 
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। गायत्री नित कलिमल दहनी॥
 
अक्षर चौविस परम पुनीता। इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥
 
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। सत्य सनातन सुधा अनूपा॥
 
हंसारूढ श्वेताम्बर धारी। स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी॥
 
पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥
 
ध्यान धरत पुलकित हित होई। सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥
 
कामधेनु तुम सुर तरु छाया। निराकार की अद्भुत माया॥
 
तुम्हरी शरण गहै जो कोई। तरै सकल संकट सों सोई॥
 
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥
 
तुम्हरी महिमा पार न पावैं। जो शारद शत मुख गुन गावैं॥
 
चार वेद की मात पुनीता। तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥
 
महामन्त्र जितने जग माहीं। कोउ गायत्री सम नाहीं॥
 
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। आलस पाप अविद्या नासै॥
 
सृष्टि बीज जग जननि भवानी। कालरात्रि वरदा कल्याणी॥
 
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। तुम सों पावें सुरता तेते॥
 
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥
 
महिमा अपरम्पार तुम्हारी। जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥
 
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। तुम सम अधिक न जगमे आना॥
 
तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा॥
 
जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। पारस परसि कुधातु सुहाई॥
 
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। माता तुम सब ठौर समाई॥
 
ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥
 
सकल सृष्टि की प्राण विधाता। पालक पोषक नाशक त्राता॥
 
मातेश्वरी दया व्रत धारी। तुम सन तरे पातकी भारी॥
 
जापर कृपा तुम्हारी होई। तापर कृपा करें सब कोई॥
 
मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें। रोगी रोग रहित हो जावें॥
 
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा। नाशै दुःख हरै भव भीरा॥
 
गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। नासै गायत्री भय हारी॥
 
सन्तति हीन सुसन्तति पावें। सुख संपति युत मोद मनावें॥
 
भूत पिशाच सबै भय खावें। यम के दूत निकट नहिं आवें॥
 
जो सधवा सुमिरें चित लाई। अछत सुहाग सदा सुखदाई॥
 
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥
 
जयति जयति जगदंब भवानी। तुम सम और दयालु न दानी॥
 
जो सतगुरु सो दीक्षा पावे। सो साधन को सफल बनावे॥
 
सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी। लहै मनोरथ गृही विरागी॥
 
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। सब समर्थ गायत्री माता॥
 
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥
 
जो जो शरण तुम्हारी आवें। सो सो मन वांछित फल पावें॥
 
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ। धन वैभव यश तेज उछाउ॥
 
सकल बढें उपजें सुख नाना। जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥
 
 
|| दोहा ||
 
यह चालीसा भक्तियुत पाठ करै जो कोई।
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय॥
 
 
|| इति श्री गायत्री चालीसा समाप्त ||
 
 
 

श्री महाकाली चालीसा
 
|| दोहा ||
 
मात श्री महाकालिका ध्याऊँ शीश नवाय ।
जान मोहि निज दास सब दीजै काज बनाय ॥
 
|| चौपाई ||
 
नमो महा कालिका भवानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥
तुम्हारो यश तिहुँ लोकन छायो। सुर नर मुनिन सबन गुण गायो॥
परी गाढ़ देवन पर जब जब। कियो सहाय मात तुम तब तब॥
महाकालिका घोर स्वरूपा। सोहत श्यामल बदन अनूपा॥
जिभ्या लाल दन्त विकराला। तीन नेत्र गल मुण्डन माला॥
चार भुज शिव शोभित आसन। खड्ग खप्पर कीन्हें सब धारण॥
रहें योगिनी चौसठ संगा। दैत्यन के मद कीन्हा भंगा॥
चण्ड मुण्ड को पटक पछारा। पल में रक्तबीज को मारा॥
दियो सहजन दैत्यन को मारी। मच्यो मध्य रण हाहाकारी॥
कीन्हो है फिर क्रोध अपारा। बढ़ी अगारी करत संहारा॥
देख दशा सब सुर घबड़ाये। पास शम्भू के हैं फिर धाये॥
विनय करी शंकर की जा के। हाल युद्ध का दियो बता के॥
तब शिव दियो देह विस्तारी। गयो लेट आगे त्रिपुरारी॥
ज्यों ही काली बढ़ी अंगारी। खड़ा पैर उर दियो निहारी॥
देखा महादेव को जबही। जीभ काढ़ि लज्जित भई तबही॥
भई शान्ति चहुँ आनन्द छायो। नभ से सुरन सुमन बरसायो॥
जय जय जय ध्वनि भई आकाशा। सुर नर मुनि सब हुए हुलाशा॥
दुष्टन के तुम मारन कारन। कीन्हा चार रूप निज धारण॥
चण्डी दुर्गा काली माई। और महा काली कहलाई॥
पूजत तुमहि सकल संसारा। करत सदा डर ध्यान तुम्हारा॥
मैं शरणागत मात तिहारी। करौं आय अब मोहि सुखारी॥
सुमिरौ महा कालिका माई। होउ सहाय मात तुम आई॥
धरूँ ध्यान निश दिन तब माता। सकल दुःख मातु करहु निपाता॥
आओ मात न देर लगाओ। मम शत्रुघ्न को पकड़ नशाओ॥
सुनहु मात यह विनय हमारी। पूरण हो अभिलाषा सारी॥
मात करहु तुम रक्षा आके। मम शत्रुघ्न को देव मिटा को॥
निश वासर मैं तुम्हें मनाऊं। सदा तुम्हारे ही गुण गाउं॥
दया दृष्टि अब मोपर कीजै। रहूँ सुखी ये ही वर दीजै॥
नमो नमो निज काज सैवारनि। नमो नमो हे खलन विदारनि॥
नमो नमो जन बाधा हरनी। नमो नमो दुष्टन मद छरनी॥
नमो नमो जय काली महारानी। त्रिभुवन में नहिं तुम्हरी सानी॥
भक्तन पे हो मात दयाला। काटहु आय सकल भव जाला॥
मैं हूँ शरण तुम्हारी अम्बा। आवहू बेगि न करहु विलम्बा॥
मुझ पर होके मात दयाला। सब विधि कीजै मोहि निहाला॥
करे नित्य जो तुम्हरो पूजन। ताके काज होय सब पूरन॥
निर्धन हो जो बहु धन पावै। दुश्मन हो सो मित्र हो जावै॥
जिन घर हो भूत बैताला। भागि जाय घर से तत्काला॥
रहे नही फिर दुःख लवलेशा। मिट जाय जो होय कलेशा॥
जो कुछ इच्छा होवें मन में। संशय नहिं पूरन हो छण में॥
औरहु फल संसारिक जेते। तेरी कृपा मिलैं सब तेते॥
 
|| दोहा ||
 
महाकलिका की पढ़ै नित चालीसा जोय।
मनवांछित फल पावहि गोविन्द जानौ सोय॥
 
|| इति श्री महाकाली चालीसा समाप्त ||

श्री गंगा चालीसा
 
।। दोहा ।।
 
जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग ।
जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग ।।
 
|| चौपाई ||
 
जय जय जननी हराना अघखानी। आनंद करनी गंगा महारानी ।।
जय भगीरथी सुरसरि माता। कलिमल मूल डालिनी विख्याता ।।
 
जय जय जहानु सुता अघ हनानी। भीष्म की माता जगा जननी ।।
धवल कमल दल मम तनु सजे। लखी शत शरद चंद्र छवि लजाई ।।
 
वहां मकर विमल शुची सोहें। अमिया कलश कर लखी मन मोहें ।।
जदिता रत्ना कंचन आभूषण। हिय मणि हर, हरानितम दूषण ।।
 
जग पावनी त्रय ताप नासवनी। तरल तरंग तुंग मन भावनी ।।
जो गणपति अति पूज्य प्रधान। इहूँ ते प्रथम गंगा अस्नाना ।।
 
ब्रम्हा कमंडल वासिनी देवी। श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि ।।
साथी सहस्त्र सागर सुत तरयो। गंगा सागर तीरथ धरयो ।।
 
अगम तरंग उठ्यो मन भवन। लखी तीरथ हरिद्वार सुहावन ।।
तीरथ राज प्रयाग अक्षैवेता। धरयो मातु पुनि काशी करवत ।।
 
धनी धनी सुरसरि स्वर्ग की सीधी। तरनी अमिता पितु पड़ पिरही ।।
भागीरथी ताप कियो उपारा। दियो ब्रह्म तव सुरसरि धारा ।।
 
जब जग जननी चल्यो हहराई। शम्भु जाता महं रह्यो समाई ।।
वर्षा पर्यंत गंगा महारानी। रहीं शम्भू के जाता भुलानी ।।
 
पुनि भागीरथी शम्भुहीं ध्यायो। तब इक बूंद जटा से पायो
ताते मातु भें त्रय धारा। मृत्यु लोक, नाभा, अरु पातारा ।।
 
गईं पाताल प्रभावती नामा। मन्दाकिनी गई गगन ललामा ।।
मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनी। कलिमल हरनी अगम जग पावनि ।।
 
धनि मइया तब महिमा भारी। धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी ।।
मातु प्रभवति धनि मन्दाकिनी। धनि सुर सरित सकल भयनासिनी ।।
 
पन करत निर्मल गंगा जल। पावत मन इच्छित अनंत फल ।।
पुरव जन्म पुण्य जब जागत। तबहीं ध्यान गंगा महँ लागत ।।
 
जई पगु सुरसरी हेतु उठावही। तई जगि अश्वमेघ फल पावहि ।।
महा पतित जिन कहू न तारे। तिन तारे इक नाम तिहारे ।।
 
शत योजन हूँ से जो ध्यावहिं। निशचाई विष्णु लोक पद पावहीं ।।
नाम भजत अगणित अघ नाशै। विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशे ।।
 
जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना। धर्मं मूल गँगाजल पाना ।।
तब गुन गुणन करत दुःख भाजत। गृह गृह सम्पति सुमति विराजत ।।
 
गंगहि नेम सहित नित ध्यावत। दुर्जनहूँ सज्जन पद पावत ।।
उद्दिहिन विद्या बल पावै। रोगी रोग मुक्त हवे जावै ।।
 
गंगा गंगा जो नर कहहीं। भूखा नंगा कभुहुह न रहहि ।।
निकसत ही मुख गंगा माई। श्रवण दाबी यम चलहिं पराई ।।
 
महँ अघिन अधमन कहं तारे। भए नरका के बंद किवारें ।।
जो नर जपी गंग शत नामा।। सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा ।।
 
सब सुख भोग परम पद पावहीं। आवागमन रहित ह्वै जावहीं ।।
धनि मइया सुरसरि सुख दैनि। धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी ।।
 
ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा। सुन्दरदास गंगा कर दासा ।।
जो यह पढ़े गंगा चालीसा। मिली भक्ति अविरल वागीसा ।।
 
 
।। दोहा ।।
 
नित नए सुख सम्पति लहैं। धरें गंगा का ध्यान ।।
अंत समाई सुर पुर बसल। सदर बैठी विमान ।।
संवत भुत नभ्दिशी। राम जन्म दिन चैत्र ।।
पूरण चालीसा किया। हरी भक्तन हित नेत्र ।।
 
|| इति श्री गंगा चालीसा स्मत्प ||
 
 


Namavali

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश जी के 108 नाम
 
ॐ गजाननाय नमः
ॐ गणाध्यक्षाय नमः
ॐ विघ्नाराजाय नमः
ॐ विनायकाय नमः
ॐ द्त्वेमातुराय नमः
ॐ द्विमुखाय नमः
ॐ प्रमुखाय नमः
ॐ सुमुखाय नमः
ॐ कृतिने नमः
ॐ सुप्रदीपाय नमः (१०)
ॐ सुख निधये नमः
ॐ सुराध्यक्षाय नमः
ॐ सुरारिघ्नाय नमः
ॐ महागणपतये नमः
ॐ मान्याय नमः
ॐ महा कालाय नमः
ॐ महा बलाय नमः
ॐ हेरंबाय नमः
ॐ लंब जठराय नमः
ॐ ह्रस्व ग्रीवाय नमः (२०)
ॐ महोदराय नमः
ॐ मदोत्कटाय नमः
ॐ महावीराय नमः
ॐ मंत्रिणे नमः
ॐ मंगल स्वराय नमः
ॐ प्रमधाय नमः
ॐ प्रथमाय नमः
ॐ प्राज्ञाय नमः
ॐ विघ्नकर्त्रे नमः
ॐ विघ्नहंत्रे नमः (३०)
ॐ विश्व नेत्रे नमः
ॐ विराट्पतये नमः
ॐ श्रीपतये नमः
ॐ वाक्पतये नमः
ॐ शृंगारिणे नमः
ॐ अश्रित वत्सलाय नमः
ॐ शिवप्रियाय नमः
ॐ शीघ्रकारिणे नमः
ॐ शाश्वताय नमः
ॐ बलाय नमः (४०)
ॐ बलोत्थिताय नमः
ॐ भवात्मजाय नमः
ॐ पुराण पुरुषाय नमः
ॐ पूष्णे नमः
ॐ पुष्करोत्षिप्त वारिणे नमः
ॐ अग्रगण्याय नमः
ॐ अग्रपूज्याय नमः
ॐ अग्रगामिने नमः
ॐ मंत्रकृते नमः
ॐ चामीकर प्रभाय नमः (५०)
ॐ सर्वाय नमः
ॐ सर्वोपास्याय नमः
ॐ सर्व कर्त्रे नमः
ॐ सर्वनेत्रे नमः
ॐ सर्वसिध्धि प्रदाय नमः
ॐ सर्व सिद्धये नमः
ॐ पंचहस्ताय नमः
ॐ पार्वतीनंदनाय नमः
ॐ प्रभवे नमः
ॐ कुमार गुरवे नमः (६०)
ॐ अक्षोभ्याय नमः
ॐ कुंजरासुर भंजनाय नमः
ॐ प्रमोदाय नमः
ॐ मोदकप्रियाय नमः
ॐ कांतिमते नमः
ॐ धृतिमते नमः
ॐ कामिने नमः
ॐ कपित्थवन प्रियाय नमः
ॐ ब्रह्मचारिणे नमः
ॐ ब्रह्मरूपिणे नमः (७०)
ॐ ब्रह्मविद्यादि दानभुवे नमः
ॐ जिष्णवे नमः
ॐ विष्णुप्रियाय नमः
ॐ भक्त जीविताय नमः
ॐ जित मन्मथाय नमः
ॐ ऐश्वर्य कारणाय नमः
ॐ ज्यायसे नमः
ॐ यक्षकिन्नेर सेविताय नमः
ॐ गंगा सुताय नमः
ॐ गणाधीशाय नमः (८०)
ॐ गंभीर निनदाय नमः
ॐ वटवे नमः
ॐ अभीष्ट वरदायिने नमः
ॐ ज्योतिषे नमः
ॐ भक्त निथये नमः
ॐ भाव गम्याय नमः
ॐ मंगल प्रदाय नमः
ॐ अव्वक्ताय नमः
ॐ अप्राकृत पराक्रमाय नमः
ॐ सत्य धर्मिणे नमः (९०)
ॐ सखये नमः
ॐ सरसांबु निथये नमः
ॐ महेशाय नमः
ॐ दिव्यांगाय नमः
ॐ मणिकिंकिणी मेखालाय नमः
ॐ समस्त देवता मूर्तये नमः
ॐ सहिष्णवे नमः
ॐ सततोत्थिताय नमः
ॐ विघात कारिणे नमः
ॐ विश्वग्दृशे नमः (१००)
ॐ विश्वरक्षाकृते नमः
ॐ कल्याण गुरवे नमः
ॐ उन्मत्त वेषाय नमः
ॐ अपराजिते नमः
ॐ समस्त जगदाधाराय नमः
ॐ सर्त्वेश्वर्य प्रदाय नमः
ॐ आक्रांत चिद चित्प्रभवे नमः
ॐ श्री विघ्नेश्वराय नमः (१०८)

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

 

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥


Kavach

Sri Narayan

Durga

श्री दुर्गा कवच
॥ अथ देव्याः कवचम्‌ ॥
विनियोग
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप्‌ छन्दः, चामुण्डा देवता, अंगन्यासोक्तमातरो बीजम्‌, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्‌, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोगः।
॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥
 
मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्‌।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥
 
ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्‌।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥2॥
 
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्‌॥3॥
 
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्‌॥4॥
 
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥
 
अग्निता दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥
 
न तेषा जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥7॥
 
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥
 
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमानरूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥
 
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥
 
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥
 
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥12॥
 
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शंख चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्‌॥13॥
 
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शांर्गमायुधमुत्तमम्‌॥14॥
 
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वस॥15॥
 
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महावले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥
 
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिन।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥
 
दक्षिणेऽवतु वाराहीनैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥18॥
 
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेद्धस्ताद् वैष्णवी तथा ॥19॥
 
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया में चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥20॥
 
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥
 
मालाधारी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥
 
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले च शांकरी॥23॥
 
नासिकायां सुगन्दा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥
 
दन्तान्‌ रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥
 
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमंगला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥
 
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू में व्रजधारिणी॥27॥
 
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च।
नखांछूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥।
 
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥
 
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥30॥
 
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥
 
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥
 
नखान्‌ दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥
 
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥
 
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥35॥
 
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥
 
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्‌।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥
 
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥
 
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥
 
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥
 
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥41॥
 
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥
 
पदमेकं न गच्छेतु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥
 
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्‌।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्‌॥44॥
 
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्‌॥45॥
 
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्‌।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥46॥
 
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥47॥
 
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जंगमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्‌॥48॥
 
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥49॥
 
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥50॥
 
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥51॥
 
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्‌॥52॥
 
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥53॥
 
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्‌।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥54॥
 
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्‌।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥55॥
 
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥56॥
 
 
॥ इति देव्याः कवचं संपूर्णम्‌ ॥
 

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥
 
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥41॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥
 
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥41॥


Stotram

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥


Mantras

Devi Maa

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥


Vrat Katha

Ravivar

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

Bhaiya Dooj

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥


Suktam

तैत्तिरीय ब्रह्मणम् । अष्टकम् – प्रश्नः – 
तैत्तिरीय संहिताः । कांड प्रपाठकः – अनुवाकम् – 
ॐ ॥ अ॒ग्निर्नः॑ पातु॒ कृत्ति॑काः । नक्ष॑त्रं दे॒वमि॑ंद्रि॒यम् । इ॒दमा॑सां विचक्ष॒णम् । ह॒विरा॒सं जु॑होतन । यस्य॒ भांति॑ र॒श्मयो॒ यस्य॑ के॒तवः॑ । यस्ये॒मा विश्वा॒ भुव॑नानि॒ सर्वा॓ । स कृत्ति॑काभिर॒भिस॒ंवसा॑नः । अ॒ग्निर्नो॑ दे॒वस्सु॑वि॒ते द॑धातु ॥ 

प्र॒जाप॑ते रोहि॒णीवे॑तु॒ पत्नी॓ । वि॒श्वरू॑पा बृह॒ती चि॒त्रभा॑नुः । सा नो॑ य॒ज्ञस्य॑ सुवि॒ते द॑धातु । यथा॒ जीवे॑म श॒रद॒स्सवी॑राः । रो॒हि॒णी दे॒व्युद॑गात्पु॒रस्ता॓त् । विश्वा॑ रू॒पाणि॑ प्रति॒मोद॑माना । प्र॒जाप॑तिग्ं ह॒विषा॑ व॒र्धय॑ंती । प्रि॒या दे॒वाना॒मुप॑यातु य॒ज्ञम् ॥ 

सोमो॒ राजा॑ मृगशी॒र्॒षेण॒ आगन्न्॑ । शि॒वं नक्ष॑त्रं प्रि॒यम॑स्य॒ धाम॑ । आ॒प्याय॑मानो बहु॒धा जने॑षु । रेतः॑ प्र॒जां यज॑माने दधातु । यत्ते॒ नक्ष॑त्रं मृगशी॒र्॒षमस्ति॑ । प्रि॒यग्ं रा॑जन् प्रि॒यत॑मं प्रि॒याणा॓म् । तस्मै॑ ते सोम ह॒विषा॑ विधेम । शन्न॑ एधि द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे ॥

आ॒र्द्रया॑ रु॒द्रः प्रथ॑मा न एति । श्रेष्ठो॑ दे॒वानां॒ पति॑रघ्नि॒याना॓म् । नक्ष॑त्रमस्य ह॒विषा॑ विधेम । मा नः॑ प्र॒जाग्ं री॑रिष॒न्मोत वी॒रान् । हे॒ति रु॒द्रस्य॒ परि॑णो वृणक्तु । आ॒र्द्रा नक्ष॑त्रं जुषताग्ं ह॒विर्नः॑ । प्र॒मु॒ंचमा॑नौ दुरि॒तानि॒ विश्वा॓ । अपा॒घशग्ं॑ सन्नुदता॒मरा॑तिम् । ॥

पुन॑र्नो दे॒व्यदि॑तिस्पृणोतु । पुन॑र्वसूनः॒ पुन॒रेतां॓ य॒ज्ञम् । पुन॑र्नो दे॒वा अ॒भिय॑ंतु॒ सर्वे॓ । पुनः॑ पुनर्वो ह॒विषा॑ यजामः । ए॒वा न दे॒व्यदि॑तिरन॒र्वा । विश्व॑स्य भ॒र्त्री जग॑तः प्रति॒ष्ठा । पुन॑र्वसू ह॒विषा॑ व॒र्धय॑ंती । प्रि॒यं दे॒वाना॒-मप्ये॑तु॒ पाथः॑ ॥ ५॥

बृह॒स्पतिः॑ प्रथ॒मं जाय॑मानः । ति॒ष्यं॑ नक्ष॑त्रम॒भि संब॑भूव । श्रेष्ठो॑ दे॒वानां॒ पृत॑नासुजि॒ष्णुः । दि॒शो‌உनु॒ सर्वा॒ अभ॑यन्नो अस्तु । ति॒ष्यः॑ पु॒रस्ता॑दु॒त म॑ध्य॒तो नः॑ । बृह॒स्पति॑र्नः॒ परि॑पातु प॒श्चात् । बाधे॑ता॒ंद्वेषो॒ अभ॑यं कृणुताम् । सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यस्याम ॥ 

इ॒दग्ं स॒र्पेभ्यो॑ ह॒विर॑स्तु॒ जुष्टम्॓ । आ॒श्रे॒षा येषा॑मनु॒यंति॒ चेतः॑ । ये अ॒ंतरि॑क्षं पृथि॒वीं क्षि॒यंति॑ । ते न॑स्स॒र्पासो॒ हव॒माग॑मिष्ठाः । ये रो॑च॒ने सूर्य॒स्यापि॑ स॒र्पाः । ये दिवं॑ दे॒वीमनु॑स॒ंचर॑ंति । येषा॑मश्रे॒षा अ॑नु॒यंति॒ कामम्॓ । तेभ्य॑स्स॒र्पेभ्यो॒ मधु॑मज्जुहोमि ॥

उप॑हूताः पि॒तरो॒ ये म॒घासु॑ । मनो॑जवसस्सु॒कृत॑स्सुकृ॒त्याः । ते नो॒ नक्ष॑त्रे॒ हव॒माग॑मिष्ठाः । स्व॒धाभि॑र्य॒ज्ञं प्रय॑तं जुषंताम् । ये अ॑ग्निद॒ग्धा ये‌உन॑ग्निदग्धाः । ये॑‌உमुल्लो॒कं पि॒तरः॑ क्षि॒यंति॑ । याग्‍श्च॑ वि॒द्मयाग्म् उ॑ च॒ न प्र॑वि॒द्म । म॒घासु॑ य॒ज्ञग्ं सुकृ॑तं जुषंताम् ॥ 

गवां॒ पतिः॒ फल्गु॑नीनामसि॒ त्वम् । तद॑र्यमन् वरुणमित्र॒ चारु॑ । तं त्वा॑ व॒यग्ं स॑नि॒तारग्ं॑ सनी॒नाम् । जी॒वा जीव॑ंत॒मुप॒ संवि॑शेम । येने॒मा विश्वा॒ भुव॑नानि॒ संजि॑ता । यस्य॑ दे॒वा अ॑नुस॒ंयंति॒ चेतः॑ । अ॒र्य॒मा राजा॒‌உजर॒स्तु वि॑ष्मान् । फल्गु॑नीनामृष॒भो रो॑रवीति ॥ 

श्रेष्ठो॑ दे॒वानां॓ भगवो भगासि । तत्त्वा॑ विदुः॒ फल्गु॑नी॒स्तस्य॑ वित्तात् । अ॒स्मभ्यं॑ क्ष॒त्रम॒जरग्ं॑ सु॒वीर्यम्॓ । गोम॒दश्व॑व॒दुप॒सन्नु॑दे॒ह । भगो॑ह दा॒ता भग इत्प्र॑दा॒ता । भगो॑ दे॒वीः फल्गु॑नी॒रावि॑वेश । भग॒स्येत्तं प्र॑स॒वं ग॑मेम । यत्र॑ दे॒वैस्स॑ध॒मादं॑ मदेम । ॥ 

आया॒तु दे॒वस्स॑वि॒तोप॑यातु । हि॒र॒ण्यये॑न सु॒वृता॒ रथे॑न । वह॒न्॒, हस्तग्ं॑ सुभग्ं॑ विद्म॒नाप॑सम् । प्रयच्छ॑ंतं॒ पपु॑रिं॒ पुण्य॒मच्छ॑ । हस्तः॒ प्रय॑च्छ त्व॒मृतं॒ वसी॑यः । दक्षि॑णेन॒ प्रति॑गृभ्णीम एनत् । दा॒तार॑म॒द्य स॑वि॒ता वि॑देय । यो नो॒ हस्ता॑य प्रसु॒वाति॑ य॒ज्ञम् ॥

त्वष्टा॒ नक्ष॑त्रम॒भ्ये॑ति चि॒त्राम् । सु॒भग्ं स॑संयुव॒तिग्ं राच॑मानाम् । नि॒वे॒शय॑न्न॒मृता॒न्मर्त्याग्॑श्च । रू॒पाणि॑ पि॒ग्॒ंशन् भुव॑नानि॒ विश्वा॓ । तन्न॒स्त्वष्टा॒ तदु॑ चि॒त्रा विच॑ष्टाम् । तन्नक्ष॑त्रं भूरि॒दा अ॑स्तु॒ मह्यम्॓ । तन्नः॑ प्र॒जां वी॒रव॑तीग्ं सनोतु । गोभि॑र्नो॒ अश्वै॒स्सम॑नक्तु यज्ञम् ॥

वा॒युर्नक्ष॑त्रम॒भ्ये॑ति॒ निष्ट्या॓म् । ति॒ग्मशृं॑गो वृष॒भो रोरु॑वाणः । स॒मी॒रय॒न् भुव॑ना मात॒रिश्वा॓ । अप॒ द्वेषाग्ं॑सि नुदता॒मरा॑तीः । तन्नो॑ वा॒यस्तदु॒ निष्ट्या॑ शृणोतु । तन्नक्ष॑त्रं भूरि॒दा अ॑स्तु॒ मह्यम्॓ । तन्नो॑ दे॒वासो॒ अनु॑जानंतु॒ कामम्॓ । यथा॒ तरे॑म दुरि॒तानि॒ विश्वा॓ ॥

दू॒रम॒स्मच्छत्र॑वो यंतु भी॒ताः । तदि॑ंद्रा॒ग्नी कृ॑णुतां॒ तद्विशा॑खे । तन्नो॑ दे॒वा अनु॑मदंतु य॒ज्ञम् । प॒श्चात् पु॒रस्ता॒दभ॑यन्नो अस्तु । नक्ष॑त्राणा॒मधि॑पत्नी॒ विशा॑खे । श्रेष्ठा॑विंद्रा॒ग्नी भुव॑नस्य गो॒पौ । विषू॑च॒श्शत्रू॑नप॒बाध॑मानौ । अप॒क्षुध॑न्नुदता॒मरा॑तिम् । ॥ 

पू॒र्णा प॒श्चादु॒त पू॒र्णा पु॒रस्ता॓त् । उन्म॑ध्य॒तः पौ॓र्णमा॒सी जि॑गाय । तस्यां॓ दे॒वा अधि॑स॒ंवस॑ंतः । उ॒त्त॒मे नाक॑ इ॒ह मा॑दयंताम् । पृ॒थ्वी सु॒वर्चा॑ युव॒तिः स॒जोषा॓ः । पौ॒र्ण॒मा॒स्युद॑गा॒च्छोभ॑माना । आ॒प्या॒यय॑ंती दुरि॒तानि॒ विश्वा॓ । उ॒रुं दुहां॒ यज॑मानाय य॒ज्ञम् ।

ऋ॒द्ध्यास्म॑ ह॒व्यैर्नम॑सोप॒सद्य॑ । मि॒त्रं दे॒वं मि॑त्र॒धेयं॑ नो अस्तु । अ॒नू॒रा॒धान्, ह॒विषा॑ व॒र्धय॑ंतः । श॒तं जी॑वेम॒ श॒रदः॒ सवी॑राः । चि॒त्रं नक्ष॑त्र॒मुद॑गात्पु॒रस्ता॓त् । अ॒नू॒रा॒धा स॒ इति॒ यद्वद॑ंति । तन्मि॒त्र ए॑ति प॒थिभि॑र्देव॒यानै॓ः । हि॒र॒ण्ययै॒र्वित॑तैर॒ंतरि॑क्षे ॥

इंद्रो॓ ज्ये॒ष्ठामनु॒ नक्ष॑त्रमेति । यस्मि॑न् वृ॒त्रं वृ॑त्र॒ तूर्ये॑ त॒तार॑ । तस्मि॑न्व॒य-म॒मृतं॒ दुहा॑नाः । क्षुध॑ंतरेम॒ दुरि॑तिं॒ दुरि॑ष्टिम् । पु॒र॒ंद॒राय॑ वृष॒भाय॑ धृ॒ष्णवे॓ । अषा॑ढाय॒ सह॑मानाय मी॒ढुषे॓ । इंद्रा॑य ज्ये॒ष्ठा मधु॑म॒द्दुहा॑ना । उ॒रुं कृ॑णोतु॒ यज॑मानाय लो॒कम् । ॥ 

मूलं॑ प्र॒जां वी॒रव॑तीं विदेय । परा॓च्येतु॒ निरृ॑तिः परा॒चा । गोभि॒र्नक्ष॑त्रं प॒शुभि॒स्सम॑क्तम् । अह॑र्भूया॒द्यज॑मानाय॒ मह्यम्॓ । अह॑र्नो अ॒द्य सु॑वि॒ते द॑दातु । मूलं॒ नक्ष॑त्र॒मिति॒ यद्वद॑ंति । परा॑चीं वा॒चा निरृ॑तिं नुदामि । शि॒वं प्र॒जायै॑ शि॒वम॑स्तु॒ मह्यम्॓ ॥ 

या दि॒व्या आपः॒ पय॑सा संबभू॒वुः । या अ॒ंतरि॑क्ष उ॒त पार्थि॑वी॒र्याः । यासा॑मषा॒ढा अ॑नु॒यंति॒ कामम्॓ । ता न॒ आपः॒ शग्ग् स्यो॒ना भ॑वंतु । याश्च॒ कूप्या॒ याश्च॑ ना॒द्या॓स्समु॒द्रिया॓ः । याश्च॑ वैश॒ंतीरुत प्रा॑स॒चीर्याः । यासा॑मषा॒ढा मधु॑ भ॒क्षय॑ंति । ता न॒ आपः॒ शग्ग् स्यो॒ना भ॑वंतु ॥

तन्नो॒ विश्वे॒ उप॑ शृण्वंतु दे॒वाः । तद॑षा॒ढा अ॒भिसंय॑ंतु य॒ज्ञम् । तन्नक्ष॑त्रं प्रथतां प॒शुभ्यः॑ । कृ॒षिर्वृ॒ष्टिर्यज॑मानाय कल्पताम् । शु॒भ्राः क॒न्या॑ युव॒तय॑स्सु॒पेश॑सः । क॒र्म॒कृत॑स्सु॒कृतो॑ वी॒र्या॑वतीः । विश्वा॓न् दे॒वान्, ह॒विषा॑ व॒र्धय॑ंतीः । अ॒षा॒ढाः काम॒मुपा॑यंतु य॒ज्ञम् ॥ 

यस्मि॒न् ब्रह्मा॒भ्यज॑य॒त्सर्व॑मे॒तत् । अ॒मुंच॑ लो॒कमि॒दमू॑च॒ सर्वम्॓ । तन्नो॒ नक्ष॑त्रमभि॒जिद्वि॒जित्य॑ । श्रियं॑ दधा॒त्वहृ॑णीयमानम् । उ॒भौ लो॒कौ ब्रह्म॑णा॒ संजि॑ते॒मौ । तन्नो॒ नक्ष॑त्रमभि॒जिद्विच॑ष्टाम् । तस्मि॑न्व॒यं पृत॑ना॒स्संज॑येम । तन्नो॑ दे॒वासो॒ अनु॑जानंतु॒ कामम्॓ ॥ 

शृ॒ण्वंति॑ श्रो॒णाम॒मृत॑स्य गो॒पाम् । पुण्या॑मस्या॒ उप॑शृणोमि॒ वाचम्॓ । म॒हीं दे॒वीं विष्णु॑पत्नीमजू॒र्याम् । प्र॒तीची॑ मेनाग्ं ह॒विषा॑ यजामः । त्रे॒धा विष्णु॑रुरुगा॒यो विच॑क्रमे । म॒हीं दिवं॑ पृथि॒वीम॒ंतरि॑क्षम् । तच्छ्रो॒णैति॒श्रव॑-इ॒च्छमा॑ना । पुण्य॒ग्ग्॒ श्लोकं॒ यज॑मानाय कृण्व॒ती ॥ 

अ॒ष्टौ दे॒वा वस॑वस्सो॒म्यासः॑ । चत॑स्रो दे॒वीर॒जराः॒ श्रवि॑ष्ठाः । ते य॒ज्ञं पा॓ंतु॒ रज॑सः पु॒रस्ता॓त् । स॒ंव॒त्स॒रीण॑म॒मृतग्ग्॑ स्व॒स्ति । य॒ज्ञं नः॑ पांतु॒ वस॑वः पु॒रस्ता॓त् । द॒क्षि॒ण॒तो॑‌உभिय॑ंतु॒ श्रवि॑ष्ठाः । पुण्य॒न्नक्ष॑त्रम॒भि संवि॑शाम । मा नो॒ अरा॑तिर॒घश॒ग्ं॒सा‌உगन्न्॑ ॥ 

क्ष॒त्रस्य॒ राजा॒ वरु॑णो‌உधिरा॒जः । नक्ष॑त्राणाग्ं श॒तभि॑ष॒ग्वसि॑ष्ठः । तौ दे॒वेभ्यः॑ कृणुतो दी॒र्घमायुः॑ । श॒तग्ं स॒हस्रा॑ भेष॒जानि॑ धत्तः । य॒ज्ञन्नो॒ राजा॒ वरु॑ण॒ उप॑यातु । तन्नो॒ विश्वे॑ अ॒भि संय॑ंतु दे॒वाः । तन्नो॒ नक्ष॑त्रग्ं श॒तभि॑षग्जुषा॒णम् । दी॒र्घमायुः॒ प्रति॑रद्भेष॒जानि॑ ॥ 

अ॒ज एक॑पा॒दुद॑गात्पु॒रस्ता॓त् । विश्वा॑ भू॒तानि॑ प्रति॒ मोद॑मानः । तस्य॑ दे॒वाः प्र॑स॒वं य॑ंति॒ सर्वे॓ । प्रो॒ष्ठ॒प॒दासो॑ अ॒मृत॑स्य गो॒पाः । वि॒भ्राज॑मानस्समिधा॒ न उ॒ग्रः । आ‌உंतरि॑क्षमरुह॒दग॒ंद्याम् । तग्ं सूर्यं॑ दे॒वम॒जमेक॑पादम् । प्रो॒ष्ठ॒प॒दासो॒ अनु॑यंति॒ सर्वे॓ ॥ 

अहि॑र्बु॒ध्नियः॒ प्रथ॑मा न एति । श्रेष्ठो॑ दे॒वाना॑मु॒त मानु॑षाणाम् । तं ब्रा॓ह्म॒णास्सो॑म॒पास्सो॒म्यासः॑ । प्रो॒ष्ठ॒प॒दासो॑ अ॒भिर॑क्षंति॒ सर्वे॓ । च॒त्वार॒ एक॑म॒भि कर्म॑ दे॒वाः । प्रो॒ष्ठ॒प॒दा स॒ इति॒ यान्, वद॑ंति । ते बु॒ध्नियं॑ परि॒षद्यग्ग्॑ स्तु॒वंतः॑ । अहिग्ं॑ रक्षंति॒ नम॑सोप॒सद्य॑ ॥ 

पू॒षा रे॒वत्यन्वे॑ति॒ पंथा॓म् । पु॒ष्टि॒पती॑ पशु॒पा वाज॑बस्त्यौ । इ॒मानि॑ ह॒व्या प्रय॑ता जुषा॒णा । सु॒गैर्नो॒ यानै॒रुप॑यातां य॒ज्ञम् । क्षु॒द्रान् प॒शून् र॑क्षतु रे॒वती॑ नः । गावो॑ नो॒ अश्वा॒ग्॒म् अन्वे॑तु पू॒षा । अन्न॒ग्ं॒ रक्ष॑ंतौ बहु॒धा विरू॑पम् । वाजग्ं॑ सनुतां॒ यज॑मानाय य॒ज्ञम् ॥ 

तद॒श्विना॑वश्व॒युजोप॑याताम् । शुभ॒ंगमि॑ष्ठौ सु॒यमे॑भि॒रश्वै॓ः । स्वं नक्ष॑त्रग्ं ह॒विषा॒ यज॑ंतौ । मध्वा॒संपृ॑क्तौ॒ यजु॑षा॒ सम॑क्तौ । यौ दे॒वानां॓ भि॒षजौ॓ हव्यवा॒हौ । विश्व॑स्य दू॒ताव॒मृत॑स्य गो॒पौ । तौ नक्ष॒त्रं जुजुषा॒णोप॑याताम् । नमो॒‌உश्विभ्यां॓ कृणुमो‌உश्व॒युग्भ्या॓म् ॥ 

अप॑ पा॒प्मानं॒ भर॑णीर्भरंतु । तद्य॒मो राजा॒ भग॑वा॒न्॒, विच॑ष्टाम् । लो॒कस्य॒ राजा॑ मह॒तो म॒हान्, हि । सु॒गं नः॒ पंथा॒मभ॑यं कृणोतु । यस्मि॒न्नक्ष॑त्रे य॒म एति॒ राजा॓ । यस्मि॑न्नेनम॒भ्यषिं॑चंत दे॒वाः । तद॑स्य चि॒त्रग्ं ह॒विषा॑ यजाम । अप॑ पा॒प्मानं॒ भर॑णीर्भरंतु ॥ 

नि॒वेश॑नी स॒ंगम॑नी॒ वसू॑नां॒ विश्वा॑ रू॒पाणि॒ वसू॓न्यावे॒शय॑ंती । स॒ह॒स्र॒पो॒षग्ं सु॒भगा॒ ररा॑णा॒ सा न॒ आग॒न्वर्च॑सा संविदा॒ना । यत्ते॑ दे॒वा अद॑धुर्भाग॒धेय॒ममा॑वास्ये स॒ंवस॑ंतो महि॒त्वा । सा नो॑ य॒ज्ञं पि॑पृहि विश्ववारे र॒यिन्नो॑ धेहि सुभगे सु॒वीरम्॓ ॥ 

ॐ शांतिः॒ शांतिः॒ शांतिः॑ ।

 

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालिसा

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥